मानव इतिहास की सबसे स्थायी और शक्तिशाली भावनाओं में से एक है – आस्था । ईश्वर, धर्म और आध्यात्मिकता की खोज ने मनुष्य को कला, संगीत, साहित्य और दर्शन की उच्चतम ऊँचाइयों तक पहुँचाया है । इसी आस्था ने उसे निस्वार्थ सेवा, प्रेम, करुणा और आत्म-बलिदान के लिए प्रेरित किया है । परन्तु, जैसा कि हर शक्तिशाली वस्तु के साथ होता है, इसका भी एक स्याह पक्ष है । जिस आस्था में मानवता को जोड़ने की असीम क्षमता है, वही आस्था जब महत्वाकांक्षी हाथों में पड़ जाती है, तो वह समाज को विभाजित करने का सबसे अचूक साधन बन जाती है । आपका यह कथन कि यह “सभी सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक सत्ता-संप्रभुता की महत्वाकांक्षा से ग्रस्त व्यक्तियों का सबसे श्रेष्ठ ‘व्यवसाय’ है,” एक निर्मम परन्तु यथार्थवादी निदान है । यह एक ऐसा ‘व्यवसाय’ है जिसका बाज़ार स्वयं मानव की आत्मा है और जिसका मुनाफा है – निर्बाध सत्ता ।
किसी भी व्यवसाय को चलाने के लिए कुछ मूलभूत तत्वों की आवश्यकता होती है: एक उत्पाद, एक बाज़ार, एक विपणन रणनीति (marketing strategy), और एक लक्ष्य । धर्म के इस भयावह व्यवसाय में ये सभी तत्व मौजूद हैं ।
उत्पाद (The Product): इस व्यवसाय का मुख्य उत्पाद है – ‘पहचान’ (Identity) । एक अनिश्चित और जटिल दुनिया में, धर्म व्यक्ति को एक सरल और शक्तिशाली पहचान प्रदान करता है । “मैं कौन हूँ ?” इस प्रश्न का उत्तर वह देता है: “तुम एक विशिष्ट समूह का हिस्सा हो, जिसे ईश्वर ने चुना है ।” यह पहचान व्यक्ति को सुरक्षा, सम्मान और एक समुदाय से जुड़े होने का भाव देती है । इसके साथ ही एक पूरक उत्पाद भी बेचा जाता है – ‘गौरवशाली अतीत का सपना’ । यह बताया जाता है कि हमारा अतीत महान था, और हमें उस गौरव को पुनः प्राप्त करना है ।
बाज़ार (The Market): इस व्यवसाय का बाज़ार हैं – आम लोग, विशेषकर वे जो अपने जीवन की कठिनाइयों, अन्यायों या अभावों से ग्रस्त हैं । जो व्यक्ति वर्तमान में असुरक्षित और भविष्य के प्रति आशंकित महसूस करता है, वह एक मज़बूत पहचान और एक सुनहरे भविष्य के वादे के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होता है । महत्वाकांक्षी सत्ता के सौदागर इसी मनोवैज्ञानिक कमजोरी का फायदा उठाते हैं ।
विपणन रणनीति (Marketing Strategy): यहीं पर इस व्यवसाय का सबसे घातक पहलू सामने आता है । इस उत्पाद को बेचने की सबसे प्रभावी रणनीति है – ‘भय का निर्माण’ । अपनी पहचान को मज़बूत करने का सबसे सरल तरीका है, किसी दूसरे को ‘शत्रु’ के रूप में प्रस्तुत करना । एक ‘हम’ को परिभाषित करने के लिए एक ‘वे’ का निर्माण आवश्यक हो जाता है । इसलिए, यह व्यवसाय ‘वैमनस्य की अग्नि’ को भड़काता है । लोगों को यह बताया जाता है:
“तुम्हारा धर्म खतरे में है !”
“दूसरे समुदाय के लोग तुम्हारे संसाधनों, तुम्हारी नौकरियों और तुम्हारी संस्कृति पर कब्ज़ा कर रहे हैं !”
“वे हमारे ईश्वर का अपमान करते हैं, हमारे पवित्र ग्रंथों को नहीं मानते, इसलिए वे दुष्ट हैं !”
“इतिहास में उन्होंने हमारे पूर्वजों पर अत्याचार किए थे, और यदि हम आज नहीं जागे, तो वे फिर से वही करेंगे !”
यह भय और घृणा की मार्केटिंग इतनी प्रभावी इसलिए है क्योंकि यह तर्क पर नहीं, बल्कि भावना पर सीधा प्रहार करती है । एक बार जब किसी समूह के मन में यह बैठा दिया जाए कि उसका अस्तित्व ही दांव पर है, तो वह समूह अपने नेताओं से कोई तर्कसंगत प्रश्न नहीं पूछता । वह केवल अपने ‘रक्षक’ के पीछे अंधा होकर चलने लगता है ।
मुनाफा (The Profit): इस व्यवसाय का अंतिम लक्ष्य या मुनाफा पैसा या संपत्ति नहीं, बल्कि वह चीज़ है जिसके लिए मनुष्य सबसे बड़े पाप करता है – ‘सत्ता-संप्रभुता’ ।
1. राजनैतिक संप्रभुता: धर्म के नाम पर विभाजित समाज वोट-बैंक में बदल जाता है । राजनेता एक समुदाय के ‘रक्षक’ के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं और दूसरे समुदाय का भय दिखाकर आसानी से चुनाव जीत जाते हैं । उनकी राजनीति विकास, शिक्षा या स्वास्थ्य पर नहीं, बल्कि केवल धार्मिक ध्रुवीकरण पर टिकी होती है ।
2. धार्मिक संप्रभुता: धार्मिक नेता और ठेकेदार इस विभाजन का उपयोग अपनी सत्ता को मज़बूत करने के लिए करते हैं । वे अपने अनुयायियों को किसी भी अन्य विचार, किसी भी सुधार या किसी भी आलोचनात्मक चिंतन से दूर रखते हैं । जो कोई भी उनके अधिकार पर सवाल उठाता है, उसे ‘धर्म-द्रोही’ घोषित कर दिया जाता है । उनकी सत्ता अनुयायियों की अज्ञानता और कट्टरता पर ही फलती-फूलती है ।
3. सांस्कृतिक संप्रभुता: कुछ महत्वाकांक्षी लोग संस्कृति के ‘रक्षक’ बन जाते हैं । वे तय करते हैं कि लोगों को क्या पहनना चाहिए, क्या खाना चाहिए, कौन सी कला देखनी चाहिए और कौन सी नहीं । वे विविधता और बहुलता को समाप्त करके संस्कृति का एक संकीर्ण और कट्टर संस्करण समाज पर थोप देते हैं, और इस प्रक्रिया में वे स्वयं संस्कृति के एकमात्र निर्णायक बन बैठते हैं ।
इस प्रकार, ईश्वर और धर्म, जो व्यक्ति को आंतरिक मुक्ति और शांति प्रदान करने का माध्यम होने चाहिए, वे सत्ता के भूखे लोगों के हाथों में आकर समाज को मानसिक रूप से गुलाम बनाने का एक ‘व्यवसाय’ बन जाते हैं । यह एक ऐसा व्यापार है जिसमें निवेश लोगों की भावनाओं का होता है, और मुनाफा कुछ चुनिंदा लोगों की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के रूप में मिलता है ।

