पिछले अनेक वर्षों से हमारी संस्कृति में “आशीर्वाद लेने व देने का व्यवसाय” बहुत अधिक प्रचलित है । और इस व्यवसाय में “आशीर्वाद लेने वाले” तो खरपतवार की भांति सूखते जा रहे हैं, लेकिन “आशीर्वाद देने वाले” अच्छी फसल की भांति लहलहाकर फलफूल रहे हैं । सदैव स्मरण रखिए कि महापुरुषों की प्रेरणा तथा मार्गदर्शन और आपका पुरुषार्थ, परिश्रम ही आपके लिए वास्तविक “आशीर्वाद” है, न कि “तथाऽस्तु” वाक्य ।
यह एक गहन विडंबना ही है कि जिस संस्कृति की नींव कर्म के सिद्धांत पर रखी गई हो, उसी संस्कृति में आज “आशीर्वाद लेने” व “देने का व्यवसाय” एक सुस्थापित उद्योग का स्वरूप ले चुका है । यह एक ऐसा विषम व्यापार है, जिसमें “आशीर्वाद देने वाले” तो एक लहलहाती हुई उत्तम फसल की भांति फलफूल रहे हैं, किंतु विडंबना देखिए कि “आशीर्वाद लेने वाले” खरपतवार की भांति निरंतर सूखते व मुरझाते जा रहे हैं । यह दृश्य केवल एक सामाजिक पतन का ही द्योतक नहीं, अपितु एक गहन आध्यात्मिक अज्ञान का भी परिचायक है, जहाँ हमने आशीर्वाद के वास्तविक मर्म को भुलाकर उसे एक वस्तु की भांति क्रय-विक्रय का साधन बना दिया है । इस समस्या की जड़ों को समझने के लिए हमें उस मानसिकता का विश्लेषण करना होगा, जो पुरुषार्थ के मार्ग को त्यागकर चमत्कार की आकांक्षा में भटक रही है ।
इस तथाकथित “आशीर्वाद के व्यवसाय” के अंकुरित होने का सबसे प्रमुख कारण है, समाज में व्याप्त भय व अकर्मण्यता । जब मनुष्य का हृदय भविष्य की अनिश्चितताओं से आशंकित होता है व उसे अपनी क्षमताओं पर विश्वास नहीं रह जाता, तब वह एक ऐसे बाहरी सहारे की खोज करता है, जो बिना किसी परिश्रम के उसके समस्त संकटों का निवारण कर दे । यहीं से “तथाऽस्तु” की आकांक्षा का जन्म होता है । यह “तथाऽस्तु” की ध्वनि व्यक्ति को क्षणिक सांत्वना तो अवश्य प्रदान करती है, परंतु यह उसे भीतर से और भी अधिक खोखला व पराश्रित बना देती है । यह एक मीठे विष के समान है, जो पुरुषार्थ करने की उसकी इच्छाशक्ति को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है । व्यक्ति यह भूल जाता है कि प्रकृति का विधान कर्म पर आधारित है, केवल कामना पर नहीं । बीज को भूमि में रोपे बिना व उसे श्रम से सींचे बिना केवल आशीर्वाद से फसल उत्पन्न नहीं हो सकती ।
आध्यात्मिक आलस्य इस व्यवसाय के लिए सबसे उर्वर भूमि प्रदान करता है । साधना, तप, स्वाध्याय व आत्म-मंथन का मार्ग कठिन व धैर्य की अपेक्षा रखने वाला है । इसके विपरीत, किसी के समक्ष नतमस्तक होकर तत्काल फल की याचना करना अत्यंत सरल प्रतीत होता है । इसी सरलता के भ्रमजाल में फंसकर जनमानस उस व्यापारी के द्वार पर पहुँच जाता है, जो आशीर्वाद का विक्रय करता है । वह यह नहीं समझ पाता कि जो आशीर्वाद बेचा या खरीदा जा सके, वह आशीर्वाद हो ही नहीं सकता, वह केवल एक मनोवैज्ञानिक छलावा है, एक सौदा है, जिसमें लेने वाला अपना आत्म-बल व आत्मविश्वास खोकर क्षणिक आशा खरीदता है । यह आध्यात्मिक अकर्मण्यता ही व्यक्ति को उसके भीतर स्थित ईश्वर से विमुख करके बाहर के प्रपंचों में उलझा देती है ।
सदैव स्मरण रखिए कि महापुरुषों की प्रेरणा, गुरुजनों का मार्गदर्शन व आपका अपना अदम्य पुरुषार्थ व अथक परिश्रम ही आपके लिए वास्तविक “आशीर्वाद” है, न कि किसी के मुख से निकला “तथाऽस्तु” वाक्य । आशीर्वाद कोई भौतिक वस्तु नहीं, जिसे एक हाथ से दूसरे हाथ में स्थानांतरित किया जा सके । आशीर्वाद एक ऊर्जा है, एक प्रेरणा है, एक मार्गदर्शन है, जो योग्य पात्र को उसकी साधना के पथ पर और अधिक वेग से अग्रसर होने की शक्ति प्रदान करता है । गुरु का सच्चा आशीर्वाद शिष्य की निर्भरता को समाप्त करता है, उसे बढ़ाता नहीं । वह शिष्य को अपनी बैसाखी नहीं पकड़ाता, अपितु उसके अपने पैरों को इतना सशक्त बना देता है कि वह स्वयं किसी भी दुर्गम मार्ग पर चल सके ।
इस सत्य को चरित्रार्थ करने वाला सबसे उत्कृष्ट उदाहरण हमें महाभारत के रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण व अर्जुन के संवाद से मिलता है । जब मोह व विषाद से ग्रस्त होकर अर्जुन ने शस्त्र त्याग दिए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसे “तथाऽस्तु, तुम्हारी विजय होगी” कहकर युद्ध के लिए खड़ा नहीं कर दिया । यदि वे चाहते, तो अपने दिव्य सामर्थ्य से एक क्षण में समस्त कौरव सेना का संहार कर सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया । क्यों ! क्योंकि ऐसा करना अर्जुन के पुरुषार्थ, उसके क्षत्रिय धर्म व उसके आत्म-विकास का अपमान होता । उन्होंने अर्जुन को पराश्रित नहीं बनाया, अपितु श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में ज्ञान का वह अमृत प्रदान किया, जिसने अर्जुन के अज्ञान-तिमिर को नष्ट कर दिया व उसके भीतर सोए हुए पुरुषार्थ को पुनः जाग्रत कर दिया ।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मार्ग दिखाया, उसे कर्म के रहस्य, आत्मा की अमरता व धर्म के मर्म से अवगत कराया । उन्होंने अर्जुन को वह विवेक व वह आत्म-बल प्रदान किया, जिससे वह स्वयं अपने शत्रुओं का सामना करने के लिए सक्षम हो सका । यही गुरु का वास्तविक आशीर्वाद है । गुरु का कार्य शिष्य के लिए युद्ध लड़ना नहीं, अपितु शिष्य को इतना कुशल योद्धा बना देना है कि वह जीवन के प्रत्येक कुरुक्षेत्र में स्वयं ही विजय प्राप्त कर सके । गीता का ज्ञान ही अर्जुन के लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद था, जिसने उसे कर्मयोगी बना दिया । आज के आशीर्वाद के व्यवसायी इस आदर्श से कोसों दूर हैं । वे लोगों को गीता का ज्ञान देकर कर्मयोगी बनाने के स्थान पर, केवल “तथाऽस्तु” का भ्रमजाल बेचकर उन्हें अकर्मण्य व भाग्यवादी बना रहे हैं ।
अतः, किसी व्यक्ति या परिस्थिति को अपने जीवन का नियंता मत बनने दीजिए ! अपने कर्म की शक्ति को पहचानिए ! आपका प्रत्येक विचार, प्रत्येक वचन व प्रत्येक कर्म आपके भविष्य का निर्माण कर रहा है । यही सनातन कर्म का सिद्धांत है । जब आप पूर्ण निष्ठा, समर्पण व परिश्रम से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं, तो समस्त ब्रह्मांड की शक्तियाँ आपकी सहायता के लिए उद्यत हो जाती हैं । यही प्रकृति का आशीर्वाद है, जिसे आप अपने पुरुषार्थ से अर्जित करते हैं, किसी की दया से भिक्षा में प्राप्त नहीं करते । महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लीजिए, उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लीजिए, यही उनका मौन आशीर्वाद है । अपने भीतर की उस दिव्य चेतना पर विश्वास कीजिए, जो अनंत शक्तियों का स्रोत है । आपका आत्म-बल ही आपके लिए सबसे बड़ा दैव-बल है । जिस दिन व्यक्ति इस सत्य को आत्मसात कर लेगा, उस दिन “आशीर्वाद का यह व्यवसाय” स्वयं ही अपनी प्रासंगिकता खो देगा व समाज पुरुषार्थ के तेज से पुनः प्रकाशित हो उठेगा ।

