‘मार्गदर्शन’ से ‘तथाऽस्तु’ तक की यात्रा का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण !

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः । माँ भगवती आप सब के जीवन को अनन्त खुशियों से परिपूर्ण करें ।

पिछले अनेक वर्षों से हमारी संस्कृति में साधु, सन्यासियों, सन्तों के पास उनसे “मार्गदर्शन” लेने के स्थान पर उनसे केवल “आशिर्वाद” में केवल “तथाऽस्तु” सुनने का प्रचलन बढ़ चुका है !
सदैव स्मरण रखिए कि महापुरूषों की प्रेरणा तथा मार्गदर्शन ओर आपका पुरूषार्थ, परिश्रम ही आपके लिए वास्तविक “आशिर्वाद” है, न कि “तथाऽस्तु” वाक्य !

यह हमारे युग की एक गहन आध्यात्मिक विडंबना है कि पिछले अनेक वर्षों से हमारी संस्कृति में साधु, संन्यासियों व संतों के पास ज्ञान-पिपासा लेकर जाने वालों की संख्या क्षीण होती जा रही है, जबकि उनसे केवल “तथाऽस्तु” सुनने की कामना रखने वालों की भीड़ निरंतर बढ़ रही है । समाज की यह प्रवृत्ति एक गंभीर भटकाव का संकेत है, जहाँ हमने गुरु व संत की वास्तविक भूमिका को विस्मृत कर दिया है । हमने उन्हें “मार्गदर्शक” के स्थान पर एक “चमत्कारी” मान लिया है, जिनसे हम अपने जीवन की समस्याओं का समाधान अपने पुरुषार्थ से नहीं, अपितु उनके मुख से निकले एक जादुई शब्द से चाहते हैं । यह मानसिकता उस रोगी के समान है, जो वैद्य से रोग का निदान व पथ्य जानने के स्थान पर केवल एक ऐसी संजीवनी की मांग करता है, जो बिना किसी संयम के उसे तत्काल स्वस्थ कर दे ।

इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रचलन के मूल में आध्यात्मिक आलस्य व परिणाम-केंद्रित भौतिकवादी सोच है । जब व्यक्ति साधना के श्रमसाध्य व धैर्यपूर्ण मार्ग पर नहीं चलना चाहता, तो वह ऐसे संक्षिप्त मार्गों की खोज करता है, जो उसे बिना किसी आंतरिक रूपांतरण के इच्छित फल प्रदान कर सकें । “तथाऽस्तु” की आकांक्षा इसी आलस्य से जन्म लेती है । यह व्यक्ति को एक क्षणिक मनोवैज्ञानिक सांत्वना तो देती है, परंतु उसे भीतर से और भी अधिक दुर्बल व पराश्रित बना देती है । व्यक्ति यह समझने में विफल रहता है कि संत का वास्तविक कार्य कृपा बरसाना नहीं, अपितु व्यक्ति को कृपा का पात्र बनाना है । वे हमें वह विवेक व वह सामर्थ्य प्रदान करते हैं, जिससे हम अपने जीवन की नौका को स्वयं ही भवसागर के पार ले जा सकें, न कि वे स्वयं हमारे नाविक बन जाएँ ।

सदैव स्मरण रखिए कि महापुरुषों की प्रेरणा, संतों का मार्गदर्शन व आपका अपना अदम्य पुरुषार्थ व अथक परिश्रम ही आपके लिए वास्तविक “आशीर्वाद” है, न कि किसी के मुख से निकला “तथाऽस्तु” वाक्य । आशीर्वाद कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसका आदान-प्रदान किया जा सके । आशीर्वाद एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार है, जो तब घटित होता है, जब एक प्रज्ज्वलित दीपक दूसरे बुझे हुए दीपक को स्पर्श कर उसके भीतर की ज्योति को जाग्रत कर देता है । एक सच्चा गुरु या संत आपके लिए कुछ करता नहीं, अपितु वह आपके भीतर ही कुछ ऐसा घटित कर देता है, जिससे आप स्वयं सब कुछ करने में सक्षम हो जाते हैं । वे आपको उत्तर नहीं देते, अपितु आपकी प्रज्ञा को इतना निर्मल कर देते हैं कि आपको अपने उत्तर स्वयं ही मिलने लगते हैं । यही वास्तविक मार्गदर्शन है, यही सच्चा आशीर्वाद है ।

इस परम सत्य का सबसे जीवंत व शाश्वत प्रमाण हमें महाभारत के कुरुक्षेत्र में मिलता है । जब मोह व विषाद के गहन अंधकार में डूबे अर्जुन ने अपने शस्त्र त्याग दिए, तब सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण ने यह नहीं कहा कि, “हे अर्जुन, तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हारी ओर से युद्ध करूँगा, तथाऽस्तु !” यदि वे ऐसा करते, तो वे अर्जुन के भीतर के उस महान योद्धा को सदा के लिए पंगु बना देते । उन्होंने अर्जुन को पराश्रित नहीं बनाया ! इसके विपरीत, उन्होंने अर्जुन को “मार्गदर्शन” दिया, जो श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में आज संपूर्ण मानवता के लिए प्रकाश स्तंभ है । उन्होंने अर्जुन के अज्ञान, उसके भय व उसकी भ्रांतियों पर प्रहार किया । उन्होंने उसे कर्म, ज्ञान, भक्ति व धर्म का मर्म समझाया ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वह दृष्टि प्रदान की, जिससे वह अपने कर्तव्य को पहचान सका व अपने पुरुषार्थ को जाग्रत कर सका । उन्होंने अर्जुन को युद्ध लड़ने की शक्ति बाहर से नहीं दी, अपितु उसके भीतर ही स्थित शक्ति को प्रकट कर दिया । यही एक सद्गुरु की पहचान है ! गीता का ज्ञान ही अर्जुन के लिए परम आशीर्वाद था, जिसने उसे एक मोहग्रस्त योद्धा से स्थितप्रज्ञ कर्मयोगी में रूपांतरित कर दिया । मार्गदर्शन की यह प्रक्रिया शिष्य को तोड़ती है, झकझोरती है व उसे एक नए स्वरूप में गढ़ती है । जबकि “तथाऽस्तु” की कामना व्यक्ति को केवल सहलाती है व उसे उसके भ्रम में ही और अधिक सुदृढ़ कर देती है ।

अतः, जब भी किसी संत या महात्मा के पास जाएँ, तो अपनी कामनाओं की सूची लेकर नहीं, अपितु अपने अज्ञान को मिटाने की प्यास लेकर जाएँ ! उनसे यह न पूछें कि “मेरा यह कार्य कब सिद्ध होगा !”, अपितु यह पूछें कि “मुझमें वह कौन सी कमी है, जिसके कारण मेरा कार्य सिद्ध नहीं हो रहा है !” उनसे सांसारिक सफलता का वरदान न मांगें, अपितु उस आंतरिक सामर्थ्य की याचना करें, जिससे सफलता व विफलता दोनों ही स्थितियों में आप अविचल रह सकें ! जिस दिन हमारा समाज संतों से “तथाऽस्तु” के स्थान पर “तत्त्वमसि” (तुम वही हो) का ज्ञान मांगने लगेगा, उसी दिन एक वास्तविक आध्यात्मिक क्रांति का सूत्रपात होगा । आपका पुरुषार्थ ही वह यज्ञ है, जिसमें गुरु का मार्गदर्शन घृत का कार्य करता है, व इसी यज्ञ से उत्पन्न हुई सफलता ही ईश्वर का वास्तविक प्रसाद व आशीर्वाद है ।